भागलपुर . भागलपुर-मालदा रेलखंड के साहेबगंज-बड़हरवा के बीच है तीनपहाड़ जंक्शन। यहां से आधा किलोमीटर दूर पॉकेटमारों की पाठशाला है। यहां किसी शैक्षणिक संस्थान की तरह ही डिग्री मिलती है। बिना बिल्डिंग व बोर्ड के चल रही इस पाठशाला में पॉकेटमारों की फौज तैयार होती है। यहां प्रोफेशनल ट्रेनिंग के साथ ही पकड़े जाने पर बचने के तरीके भी सिखाए जाते हैं।
पहली बार गोरखधंधे की इस पाठशाला की पूरी कहानी आपको बता रहा है…। मकसद सिर्फ एक है, आप जान जाएं कि पॉकेटमारी का नेटवर्क कैसे ऑपरेट होता है, और इससे कैसे बचा जा सकता है। भास्कर टीम ने इसके लिए 6 माह में पकड़ाए पॉकेटमारों से बात की और जाना कि उन्होंने पॉकेटमारी कैसे सीखी, किसने सिखाया। इसी क्रम में एक पॉकेटमार ने अपने ट्रेनर से मुलाकात करवाई, जिसे सब ‘गुरुजी’ कहते हैं।
गुरुजी ने तीनपहाड़ पर बुलाया। मुंह पर गमछा बांधे था। चेले भी इसी वेश में थे। उसने बताया कि कैसे तैयार किए जाते हैं नए पॉकेटमार! ट्रेनिंग का पहला स्टेप है छोटे जगहों पर हाथ साफ करना। नए सदस्य पॉकेटमारी का परसेंटेज गुरुजी को देते हैं। पहले सभी को छोटे जगहों पर भेजा जाता है फिर बड़े भीड़-भाड़ वाले इलाकों में।

गुरु की पाठशाला : पॉकेटमारों के एक ग्रुप में चार लोग होते हैं। पहले का काम टारगेट करना। दूसरे का ब्लेड मारना। तीसरे का हाथ साफ कर चौथे को माल देना होता है। ग्रुप के पास ब्लेड, फेविकॉल, टेप और कैंची होती है। गुरु ट्रेनिंग के दौरान ब्लेड को तोड़ता है, अंगुलियों में फंसाता है। फेविकॉल से चिपकाता व टेप साटता है। और फिर दो अंगुलियों से नोट निकालने का तरीका समझाता है। इस प्रक्रिया को सलाईफांसा कहते हैं। ब्लेड जेब की सिलाई से दो अंगुली ऊपर चलाने को कहता है ताकि सिक्के बाहर ना गिरंे। ब्लेड स्ट्रेट चले। आड़ा-तिरछा नहीं। गुरु लौकी पर ब्लेड चलाकर डेमो भी देता है।
शिष्यों का कारनामा : धंधे का लाइनर बार-बार जेब टटोलने वाले को टारगेट बनाता है। दूसरे सदस्य को जानकारी देता है। टारगेटेड व्यक्ति का ट्रेन, बस आदि पर चढ़ने के दौरान ध्यान गेट पर होता है। इसी वक्त गिरोह पर्स निकाल लेता है। और ग्रुप के लास्ट मेंबर को थमा देता है। जो सजग होते हैं गिरोह ऐसे लोगों को पहले भरमाता है। टारगेट जैसे ही जाल में फंसता है, गिरोह अपना काम कर जाता है। काम नहीं हुआ तो साथ में सफर भी करता है। पान या गुटका खाकर ऐसे थूकता है कि लोग झगड़ने लगें। इसी दौरान ग्रुप हाथ साफ कर देता है। ग्रुप गमछा या मफलर का इस्तेमाल लोगों की निगाह से बचने के लिए करता है।
पॉकेटमार पकड़ा गया तो 3 जुट जाते हैं छुड़ाने में
सवाल : कहां तक पढ़ाई की है?
जवाब : इंटर तक पढ़े हैं।
सवाल : खुद ट्रेनिंग कहां से ली थी?
जवाब :इसी तीनपहाड़ पर।
सवाल : कब-कब देते हैं ट्रेनिंग?
जवाब :समय कुछ नहीं। जो नया है, उसका अलग समय है।
सवाल : पुराने वाले कब आते हैं?
जवाब :गुरुदक्षिणा देने साल में एक बार।
सवाल : कितना गुरु दक्षिणा है?
जवाब :10 प्रतिशत मिल जाता है।
सवाल : और किसे मिलता है हिस्सा ?
जवाब :पुलिस को तो देना ही पड़ता है। बिना दिए काम कहां होने वाला है।
सवाल : क्यों करते हो ऐसा काम?
जवाब :ये काम हमारा हुनर है, हमारे लिए पेट का सवाल है।
सवाल : कैसे ट्रेनिंग देते हैं लड़कों को?
जवाब : अगर छोटे प्लेटफॉर्म पर लड़का काम कर लेता है तो धंधे में उसे मैट्रिक पास कहते हैं, फिर भागलपुर जैसे जगह में सफल तो बीए पास और बंबई-कोलकाता दिल्ली से काम कर ले ताे मास्टर।
सवाल : पॉकेटमारी का क्या तरीका है?
जवाब :ग्रुप होता है। ग्रुप में चार लोग होते हैं। पहला टारगेट करता है, दूसरे को लोकेशन बताता है जो काम को अंजाम देता है। तीसरा पर्स निकाल चौथे को दे देता है।
सवाल :कोई पकड़ा गया तो?
जवाब :अगर पकड़ा गया है तो बाकी तीन बंदे भीड़ के बीच ही उसे छुड़ाने की कोशिश करते हैं। पिटाई होती है तो उसे पीटते हुए बाहर निकालने की कोशिश करते हैं।
सवाल कैसे ट्रैप करते हैं?
जवाब :दुकान पर लोग पर्स निकालते हैं तो पर्स का कलर देख उसी कलर का पर्स गिराकर उसे भरमाते हैं। जब वो उसे उठाने झुकता है तो अपना काम कर लेते हैं।


