नवगछिया में चार दशक पहले केले की खेती शुरू कर समृद्ध होने वाले किसान अब इससे मुंह मोडऩे लगे हैं। इसकी जगह उन्होंने लीची का बगान लगाना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि नवगछिया में हाल के वर्षों में केले का रकबा तेजी से घटा है।

तुलसीपुर के किसान अजीत कुमार और जयरामपुर के ललन कुमार बताते हैं कि केले की खेती को मिट्टी जनित पनामा बिल्ट एवं सिगाटोका फंगस रोग ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। हर साल फसल बर्बाद हो जा रही है। यही वजह है कि जिन किसानों के पास 10 एकड़ जमीन है, उनमें से चार एकड़ में वे केले की खेती बंद कर लीची का बाग लगा रहे हैं। इससे लीची के बागों का विस्तार हो रहा है। बताते चलें कि चार दशक पहले नवगछिया में किसानों ने केले की व्यापक पैमाने पर खेती शुरू की थी। यह मकई की तुलना में लाभदायक साबित हुई। इसने यहां के किसानों की तकदीर बदल दी थी।

नवगछिया के केले का यूपी में बाजार हुआ प्रभावित

खेती से मुंह मोडऩे का दूसरा बड़ा कारण उत्तर प्रदेश में नवगछिया के केला का बाजार प्रभावित होना भी बताया जाता है। पूर्व में नवगछिया के केले का उत्तरप्रदेश बड़ा बाजार था। यहां का 75 फीसद केला बनारस, इलाहाबाद सहित अन्य शहरोंं में ही खपाया जाता था। जब से वहां के आलू उत्पादक किसानों को अपने उत्पाद का लागत मूल्य तक नसीब नहीं होने लगा तो वहां के किसानों ने भी आलू छोड़ केले की खेती शुरू कर दी। अब वहां के बाजारों में नवगछिया के केले की कोई पूछ नहीं रह गई है।

लीची की खरीदारी के लिए देश-विदेश से आएंगे व्यापारी

नवगछिया के किसानों को भरोसा है कि लीची फसल का धीरे-धीरे क्षेत्र विस्तार होने से यहां उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल सहित नेपाल से बड़े व्यापारी भी इस रसीले फल की खरीदारी के लिए आएंगे। लीची उत्पादक किसानों को बेहतर बाजार मूल्य भी मिलेगा।

लीची के बाग से मिल रहा तीन तरह का लाभ

ध्रुवगंज के किसान पिंकू और अमरपुर के संजय कुमार आदि ने बताया कि लीची के बाग से यहां के किसानों को तीन तरह का लाभ मिल रहा है। एक तो मंजर के समय मधुमक्खी पालक मधु उत्पादन के लिए इस क्षेत्र में आते है। बागों में 250 बक्स लगाने के एवज में वे पांच हजार तक की राशि भी भुगतान करते हैं। मधुमक्खियों के द्वारा परागन की क्रिया में तेजी आने का लाभ भी मिलता है। लीची सहित आसपास में लगी मक्का, धनिया एवं सरसों की उत्पादकता भी 20 फीसद तक बढ़ जाती है।

Lichees hanging on the tree / Tropical fruit

यूं होती है अनुमंडल में खेती

केला – खरीक, बिहपुर, नवगछिया, रंगरा चौक, ईस्माइलपुर तथा नारायणपुर को मिलाकर पांच हजार एकड़

लीची : बिहपुर में 715 एकड़, नवगछिया – 350 एकड़, गोपालपुर-250 एकड़, खरीक-600 एकड़ सहित रंगरा चौक में भी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है।

कृषि विज्ञान केंद्र सबौर के उद्यान वैज्ञानिक डॉ. ममता कुमारी ने कहा कि नवगछिया अनुमंडल की मिट्टी एवं वहां की आबोहवा लीची फसल के लिए अनुकूल है। वहां की गुणवत्तापूर्ण लीची की खरीदारी के लिए देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ नेपाल के व्यापारी भी खरीदारी के लिए आते हैं। यह बहुवर्षीय फसल है। इसमें हर साल फलन होता है। बीमारियां भी कम लगती है।

📲 Naugachia News WhatsApp Group Join करें
Join Now →

By न्यूज़ डेस्क

न्यूज़ को शेयर करे और कमेंट कर अपनी राय दे.....

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *