नवगछिया। नवगछिया बाजार के हृदय स्थल पर स्थित लगभग 200 वर्ष पुराने बड़ी शीतला माता मंदिर का हाल ही में विधि-विधान के साथ जीर्णोद्धार संपन्न हुआ। मंदिर में आयोजित वैदिक अनुष्ठान में 11 ब्राह्मणों ने पूजा-पाठ एवं हवन कराया, जबकि मुख्य यजमान कन्हैया लाल केडिया रहे। इस धार्मिक आयोजन में केडिया समाज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। जानकारी के अनुसार, केडिया समाज की कुलदेवी माँ शीतला हैं, इसलिए समाज के सभी परिवारों ने आयोजन में बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभाई।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर केवल अपनी प्राचीनता के कारण ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के कारण भी विशेष पहचान रखता है। मंदिर में माँ शीतला अपनी सातों बहनों के साथ शिला स्वरूप में विराजमान हैं। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां माता का साक्षात वास है और उनकी कृपा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
सबसे खास बात यह थी कि इस मंदिर में प्रतिदिन न तो सुबह की आरती होती है और न ही शाम की आरती, फिर भी श्रद्धालुओं की आस्था में कभी कमी नहीं आई। वर्षों से लोग यहां अपनी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करने पहुंचते थे और माता के प्रति उनकी आस्था लगातार बढ़ती जा रही है।


शीतला अष्टमी पर लगता है श्रद्धालुओं का सैलाब
स्थानीय निवासी रवि शर्मा ने बताया कि शीतला अष्टमी के अवसर पर इस मंदिर में हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। सुबह से ही मंदिर परिसर में लंबी-लंबी कतारें लग जाती हैं और श्रद्धालु घंटों इंतजार कर माता के दर्शन करते हैं। नवगछिया ही नहीं, आसपास के कई क्षेत्रों से भी लोग यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं।
पीपल का ऐतिहासिक वृक्ष भी आस्था का केंद्र
मंदिर परिसर में स्थित विशाल पीपल का वृक्ष भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। प्रत्येक शनिवार को सुबह करीब चार बजे से ही श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना शुरू हो जाता है। दिनभर पूजा-अर्चना का क्रम चलता रहता है और शाम होते-होते वृक्ष के चारों ओर दीपों की कतारें सज जाती हैं। दीपों की रोशनी से पूरा परिसर आध्यात्मिक वातावरण में डूब जाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह वही प्राचीन पीपल का वृक्ष है, जिसका संबंध नवगछिया के इतिहास से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि नवगछिया का नाम नौ वृक्षों (नौ गाछ) के आधार पर पड़ा था, और यह वृक्ष उन्हीं ऐतिहासिक वृक्षों में से एक माना जाता है। आज भी यह विशालकाय वृक्ष मुख्य बाजार के बीचों-बीच अपनी ऐतिहासिक पहचान बनाए हुए है।
बुजुर्गों से जुड़ी लोकमान्यताएं
क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि इस पीपल वृक्ष पर भगवान शनिदेव का वास माना जाता है। इसलिए प्रत्येक शनिवार को श्रद्धालु तेल का दीपक जलाकर और पूजा-अर्चना कर शनि देव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
वहीं, गांव के बुजुर्ग एक रोचक लोककथा भी सुनाते हैं। उनके अनुसार, उनकी दादी बताया करती थीं कि एक बार उन्होंने संध्या बेला में माँ लक्ष्मी को कन्या रूप में इस पीपल वृक्ष से उतरकर मंदिर में प्रवेश करते देखा था। हालांकि जब तक वे मंदिर के भीतर पहुंचीं, वह दिव्य कन्या वहां से अदृश्य हो चुकी थी। इस घटना को लोग आज भी माता की दिव्य उपस्थिति और मंदिर की पवित्रता से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, इस तरह की लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती; इन्हें स्थानीय श्रद्धा और परंपरा के रूप में देखा जाता है।
मंदिर के जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण का कार्य समाजसेवी संजय मामंडिया की देखरेख में संपन्न हुआ। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से मंदिर के जीर्णोद्धार की मांग की जा रही थी, जो अब पूरी हो गई है। मंदिर के नए स्वरूप से श्रद्धालुओं में खुशी का माहौल है और लोगों को उम्मीद है कि यह ऐतिहासिक एवं धार्मिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आस्था का प्रमुख केंद्र बनी रहेगी।

