नवगछिया : सिंह नक्षत्र में 16 अगस्त को मां विषहरी की प्रतिमाएं बेदी पर स्थापित होंगी। नवगछिया में कई जगहों पर प्रतिमाएं स्थापित होंगी। मूर्तिकारों द्वारा प्रतिमा का निर्माण चल रहा है। 16 अगस्त की रात सिंह नक्षत्र के प्रवेश के साथ प्रतिमा बेदी पर स्थापित हो जाएंगी। केंद्रीय विषहरी पूजा समिति के कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप कुमार ने बताया कि मां विषहरी की पूजा बाड़ी पूजा के साथ 16 जुलाई की रात्रि से शुरू हो चुकी है। यह पूजा एक माह तक होगी।

Whatsapp group Join

मंदिरों व विभिन्न स्थलों में प्रतिदिन भजन, संध्या आरती व पूजन का कार्यक्रम हो रहा है। 16 अगस्त को सिंह नक्षत्र के प्रवेश के साथ बेदी पर प्रतिमाएं स्थापित होंगी। इसके बाद 17 अगस्त को कुंवारी डलिया चढ़ाया जायेगा। संध्या समय बाला लखेंद्र की बारात निकाली जायेगी। रात में सर्प दंश की प्रक्रिया करायी जायेगी। इसके बाद 18 अगस्त को सुहागिन महिलाएं सुहाग की रक्षा के लिए डलिया चढ़ायेंगी। 19 अगस्त को विसर्जन होगा।

उधर चंपानगर के मंजूषा कलाकार व शोधकर्ता हेमंत कुमार ने बताया कि सिंह नक्षत्र में बाला लखेंद्र को नाग ने डंसा था, इसीलिए इसी नक्षत्र में बेदी पर प्रतिमाएं स्थापित होती हैं। सुहागरात के दिन ही विषहरी के भेजे दूत नाग ने रात्रि 12 बजे सिंह नक्षत्र के प्रवेश करते ही बाला लखेंद्र को डस लिया। जिससे उनकी मौत हो गयी। बिहुला सती थी, इसलिए उसने हार नहीं मानी और मंजूषा पर चढ़ कर देवलोक गयी और पति सहित 56 कोरी मल्लाह छह जेठों सहित सोनामुखी जहाज धन संपदा के साथ लौटी थी। उन्होंने बताया कि मंजूषा एक नाव था, जिसका निर्माण खुद शिल्पराज विश्वकर्मा ने किया था। इसकी भित्ती पर लहसन मालाकर ने चित्रकारी की थी। इस चित्रकारी के माध्यम से उनके मरने की घटना का वर्णन किया था। इसी नाव से पुन: सती बिहुला लौट कर भी आयी थी। इसलिए तभी से मंजूषा का भी महत्व बढ़ गया।

वहीं मनसा माहत्म्य बिहुला विषहरी कथा के लेखक आलोक कुमार ने बताया कि बिहुला विषहरी की कहानी चंपानगर के तत्कालीन बड़े व्यवसायी और शिवभक्त चंद्रधर सौदागर से शुरू होती है। विषहरी शिव की मानस पुत्री कही जाती हैं लेकिन उनकी पूजा नहीं होती थी। विषहरी ने सौदागर पर दबाव बनाया पर वह शिव के अलावा किसी और की पूजा को तैयार नहीं हुए। आक्रोशित विषहरी ने उनके 6 पुत्रों सहित 56 कोरी मल्लाह और छह डेंगी नौका सहित उनके सोनामुखी जहाज को त्रिवेणी चंपा और गंगा के मिलन के स्थान में डूबोकर विनाश शुरू कर दिया। छोटे बेटे बाला लखेन्द्र की शादी बिहुला से हुई थी।

उनके लिए सौदागर ने लोहे का एक घर विश्वकर्मा से निर्मित करवाया उसमें एक भी छिद्र न रहे। विषहरी के कहने से उसमें बाल के बराबर छिद्र छोड़ दिया गया था। उसमें नाग मनिहार को प्रवेश कराकर लखेन्द्र को डसवाया था। इसके बाद सती हुई बिहुला पति के शव विशाल लोहे के मंजूषा पर सवार होकर चंपा से गंगा के रास्ते असम तक जाती है जहां उसे नेतुला नमक स्वर्ग के वस्त्र धोने वाली धोबन मिलती है जिनके माध्यम से बिहुला स्वर्गलोक तक चली गई और पति का प्राण वापस कर आयी। सौदागर भी विषहरी की पूजा के लिए तैयार हुए लेकिन बाएं हाथ से। तब से आज तक विषहरी पूजा में बाएं हाथ से ही पूजा होती है।

By न्यूज़ डेस्क

न्यूज़ को शेयर करे और कमेंट कर अपनी राय दे.....

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *