नवगछिया के तेतरी गांव स्थित शक्तिपीठ देवी दुर्गा मंदिर का इतिहास 423 वर्ष पुराना है। मंदिर में पूजा के अवसर पर भव्य मेला लगाता है। मेला समिति के अध्यक्ष रामाकांत राय ने बताया कि 1600 ई. में मंदिर की स्थापना की गई थी। वर्षों पहले तेतरी गांव के लोगों को स्वप्न आया था कि कलबलिया धार में एक मेढ़ बहकर आया है, जिसपर दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करें। इस पर गांववालों ने कलबलिया धार में जाकर देखा तो वहां एक मेढ़ पड़ा था। पांच-छह लोग मेढ़ उठाकर तेतरी लाने लगे। इसी बीच मंदिर वाले स्थान पर मेढ़ को रखकर ग्रामीण विश्राम करने लगे। तभी खरीक के काजीकौरेया गांव के कुछ लोग मेढ़ खोजते हुए आ गए।


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वे लोग मेढ़ वापस ले जाना चाहते थे। इस पर तेतरी गांव के लोग सहर्ष तैयार हो गए। काजीकौरेया के लोग मेढ़ वापस ले जाने के लिए उठाने लगे तो मेढ़ तनिक भी नहीं हिला। अंतत: वे लोग वापस अपने गांव चले गए। इसके बाद तेतरी के ग्रामीणों ने मेढ़ को उठाकर दूसरे जगह ले जाने का प्रयास किया। किंतु मेढ़ टस से मस नहीं हुआ। इस तरह उसी जगह पर दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।

विशेषता : मंदिर में देवी दुर्गा की एक भव्य प्रतिमा विराजमान है, जिनकी पूजा-अर्चना के लिए सालों भर लोगों की भीड़ जुटी रहती है। दुर्गा पूजा के समय उस प्रतिमा के आगे मां दुर्गा की अलग से भी एक प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। दशमी को काफी भव्य तरीके से उस प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन के समय श्रद्धालुओं की संख्या लाख से उपर पहुंच जाती है।

आयोजन : मंदिर परिसर में पूजा के अवसर पर भव्य मेला लगाता है। मेले का मुख्य आकर्षण टावर झूला, ब्रेक डांस, मौत का कुंआ, मनिहारा और फर्नीचर का बाजार होता है। मंदिर परिसर की सुरक्षा के लिए सीसी कैमरे लगाए जाते हैं। मंदिर परिसर में भारी संख्या में पुलिस पदाधिकारियों एवं दंडाधिकारी की तैनाती होती है। यहां भागलपुर सहित आसपास के जिलों से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।

By न्यूज़ डेस्क

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