नीलेश कुमार, नवगछिया (भागलपुर) मंगलवार का दिन न जाने कितने हजार घर-परिवारों के लिए अमंगलवार हो गया। सुबह की सबसे पहली मनहूस खबर आई बड़ी घाट ठाकुरबाड़ी से। भोर की बेला में जिस वक्त सूर्य अपने तेज को प्राप्त करने की यात्रा पर था, नवगछिया का एक सूर्य अस्त हो चुका था। जिस वक्त माताएं फूलाली लेकर ठाकुरबाड़ी पूजा के लिए घर से निकल रही थीं और नगरवासी पुरुष भी ईश्वर और अपने आराध्य गुरुदेव से आशीर्वाद लेने को पहुंचनेवाले थे, उससे पहले महंथ सीताराम शरणजी महाराज अपना देह त्याग चुके थे। बेखबर श्रद्धालुओं के बाखबर होने से पहले वह इस दैहिक दुनिया को छोड़ दैविक दुनिया की ओर निकल चुके थे। सुबह का माहौल चिड़ियों की चहचहाहट से अचानक हजारों महिला-पुरुषों की रुलाहट-चिल्लाहट में तब्दील था। मंदिर की घंटियों की आवाज लोगों के रोने-चिल्लाने के शोर में दब चुकी थी। पूजा की लोटकी से जो गंगा जल गुरुदेव के पैरों को धोने को निकलते, अब उसकी जगह अश्रुधाराएं बहे जा रही थी। नवगछिया शहर जैसे अनाथ हो चला था।


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जिस प्रकार देवों के देव महादेव होते हैं, उसी तरह वे महात्माओं के महात्मा थे। वे न केवल नवगछिया के पिता थे, बल्कि देश-दुनिया में प्रवास कर रहे शिष्यों व उनके परिवारों के लिए वे ही अभिभावक थे। छोटी से छोटी खुशियों से लेकर बड़े से बड़ा दु:ख उनके दर्शन व मार्गदर्शन से छू-मंतर हो जाया करता था।

यह दु:ख केवल हमारा नहीं, हम जैसे हजारों का है

सुबह जब फोन पर मम्मी ने और फिर पापा ने यह खबर सुनाई, तो यकीन कर पाना मुश्किल था। अभी होली में जब घर गया था, तो उनका आशीर्वाद लिया था, लेकिन मेरे लिए प्रत्यक्ष तौर पर यह उनका अंतिम आशीर्वाद होगा, कभी सोचा नहीं था। मैं, ये जो अपना, अपने माता-पिता का दु:ख लिख पा रहा हूं, यह केवल हमारा दु:ख नहीं है, बल्कि यह हजारों परिवारों का दु:ख है।

औरों की तरह मेरे माता-पिता(संजय प्रसाद भगत और सरिता देवी) भी उनके दीक्षित शिष्य हैं। मेरे माता-पिता के भी माता-पिता इस दुनिया को छोड़ स्वर्ग सिधार चुके हैं। ऐसे में मेरे माता-पिता के लिए उनके आराध्य, उनके गुरुदेव महात्मा जी ही माता-पिता थे। ऐसे में वे ही मेरे लिए दादा-नाना के समान रहे। अपने अबतक के इस छोटे से जीवनकाल में मुझे उनका सान्निध्य तब मिला, जब मैं कैरियर, स्वास्थ्य, भविष्य को लेकर बुरे दौर से गुजर रहा था। मैं उनके लिए उनके दीक्षित शिष्यों का पुत्र था और उन्होंने ही मुझे उस बुरे दौर में संभाला और फिर उनके ही आशीर्वाद से ऐसा सुखद संयोग बना कि उनके शिष्य परमहंस स्वामी आगमानंद जी महाराज का सान्निध्य मुझे प्राप्त हुआ।

बेटा, गुरु का नाम नहीं लिया करते

मेरे एक मौसेरे मामा हैं, सुधीर नाम है। महंथ सीतारामशरण जी महाराज का भी यही नाम है। मम्मी बचपन में जब मामा के बारे में बताती तो मेरे पूछने पर कि कौन से वालो मामा, वह कहती- वही, जोकि गुरुजी का नाम है। नाम क्यों नहीं लेतीं, यह पूछने पर कहतीं कि जैसे पति, भैंसुर का नाम नहीं लेती! तो गुरु का स्थान तो बहुत ऊपर है, यूंही उनका नाम अपनी जुबां पर नहीं ला सकती। अब हमारी पीढ़ी तो नाम लिया करती है, हां, लेकिन मम्मी की ही सिखाई हुई यह बात जरुर ध्यान में रहती है कि गुरु की निंदा नहीं सुननी चाहिए। मैंने कई अवसरों पर निंदकों को व्यवहारिक जवाब देकर खारिज भी किया है।

उनका सायंकालीन प्रवचन और बुजुर्गों की भीड़ में मैं बच्चा

अपने जीवन में भटकाव का समय, जब दुर्योगवश मैं घर में अकेला रहा करता था। पापा अपनी ड्यूटी, भैया अन्य शहर में और दीदी की सरकारी जॉब के कारण मम्मी का पूर्णिया जिला में रहना। गुरुजी हर शाम प्रवचन किया करते थे, जोकि जीवनपर्यंत जारी रहा। उस दौरान बच्चा बाबू, कृष्णा चाचा, विनोद भैया, अवधेश गुप्ता चाचा और भी बाजार के कई गुरुभाई लोग सुनने जुटते थे। दिनभर की दुनियादारी से यहां एक अलग सुकून था। किशोर अवस्था से युवावस्था की दहलीज पर कदम रख रहा मेरी उम्र का कोई इस श्रोता दीर्घा में शामिल नहीं था। हड़िया पट्टी स्थित एक गल्ला व्यवसाई मिट्ठु भैया का साथ मुझे मिला। दोस्ताना संबंध था और वह मेरी उम्र के करीब थे, सो उनके साथ गुरुजी का प्रवचन सुनते हुए मुझपर लोगों की बातों का असर होना बंद हो गया। मुझे यहां शांति मिलती थी। यहां मुझे भी जीवन के व्यवहारों से अवगत होने का सौभाग्य मिला।

महात्मा मरते थोड़े न हैं, वे अब भी यहीं कहीं हैं

महात्मा बहुत बड़ी उपाधि होती है। जिनकी आत्मा महान हो। यह उपाधि आचरण से मिलती है। उसी तरह हर महंथ या बाबा संत नहीं हो सकते थे। सीतारामशरण जी महाराज संत भी थे और महात्मा भी। अपने जीवनकाल में होश होने के बाद जिन पहले महात्मा से मैं अवगत हुआ, वह मेरे माता-पिता के गुरु यानि कि सीतारामशरण जी महाराज ही थे। थे नहीं, बल्कि हैं। उनके जाने से हम तमाम लोग शोकाकुल तो हैं, लेकिन यह भी उनकी ही तरह परम सत्य है कि उन्होंने केवल देह त्यागा है, मन नहीं, आत्मा नहीं। उनकी देह हमसे दूर हुई है। वे अब भी हमारे बीच ही हैं और हमेशा रहेंगे। इतने हजारों परिवारों की जिम्मेदारी जो है उनपर, यूं दुनिया के भरोसे छोड़ थोड़े ही जाएंगे। वैसे भी महात्मा मरते थोड़े न हैं, वे तो अमर होते हैं।

? लेखक नीलेश कुमार हिन्दुस्तान (अखबार) में वरीय संवाददाता हैं और महात्मा के शिष्य परिवार से हैं।

By न्यूज़ डेस्क

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