नवगछिया। शारदीय नवरात्र की सप्तमी तिथि पर प्रखंड क्षेत्र के सभी मंदिरों और घरों में मां कालरात्रि की पूजा-अर्चना श्रद्धा और आस्था के साथ की गई। मान्यता है कि माता दुर्गा का सातवां स्वरूप कालरात्रि पापियों का संहार करने के लिए धरती पर अवतरित होती हैं। इन्हें काली मां के नाम से भी जाना जाता है।

दयालपुर दुर्गा मंदिर की धार्मिक मान्यता विशेष है। श्रद्धालु मानते हैं कि यहां विराजमान माता कालरात्रि की पत्थर की प्रतिमा इतनी सजीव प्रतीत होती है मानो अभी बोल पड़ेंगी।

250 साल पुराना इतिहास

दयालपुर गांव स्थित इस मंदिर की स्थापना लगभग 250 वर्ष पूर्व चंदेल वंश के राजा गंगा प्रसाद सिंह द्वारा की गई थी। मान्यता है कि यहां विशेष रूप से संतान प्राप्ति की कामना लेकर भक्त आते हैं और उनकी मनोकामना पूरी होती है। यहां तांत्रिक विधि से विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है।

संतानों के अनुसार दी जाती थी बली

मंदिर के आचार्य रमेश प्रसाद सिंह के अनुसार प्राचीन परंपरा के मुताबिक, जिन परिवारों की जितनी संतान होती थी उतनी ही बली चढ़ाई जाती थी। वह बताते हैं कि पहले दयालपुर के आसपास के गांवों में यह एकमात्र मातारानी का मंदिर हुआ करता था।

100 साल बाद स्थापित हुआ दूसरा मंदिर

करीब 100 वर्ष पूर्व इसी मंदिर से अलग कर गांव के चौराहे पर एक और मंदिर की स्थापना की गई, जिसकी सेवा वर्तमान में मृत्युंजय कुमार झा द्वारा की जाती है।

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By न्यूज़ डेस्क

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