बिहार के 3.7 लाख नियोजित शिक्षकों की समान काम समान वेतन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई एक बार फिर टल गई। सुनवाई के दौरान शिक्षक संघ के वकील ने राज्य सरकार से पूछा कि नियोजित शिक्षकों को समान वेतन के लिए आर्थिक संकट है, तो फिर साढ़े पांच लाख संविदाकर्मियों को वेतनमान की तैयारी कैसे है। अब अगली सुनवाई 21 अगस्त को होगी।
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शिक्षक संघ के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा नियोजित शिक्षकों को समान वेतन देने में लगभग 5 हजार करोड़ ही खर्च होंगे। केंद्र सरकार शिक्षा सेस लेती है। 2016-17 में 85 हजार करोड़ सेस मिला, जिसमें मात्र 35 हजार करोड़ ही खर्च हुए। ऐसे में केंद्र सरकार आर्थिक संकट का रोना के बजाय बिहार में शिक्षकों को समान वेतन देने के लिए आवश्यक राशि दे सकती है।
कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने पूछा- नियमित शिक्षकों के रिटायरमेंट के बाद यह जगह कौन ले रहा है। इस पर शिक्षक संघ के वकील ने कहा कि सरकार नियमित शिक्षकों का पद समाप्त करने की बात कर रही है, लेकिन नियोजित शिक्षक ही तो सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। उन्होंने कोर्ट को एक सर्वे रिपोर्ट का हवाला देकर कहा- नियोजित शिक्षकों के कारण पिछले 10 साल में बिहार की शिक्षा व्यवस्था में सुधार आया है।

‘समान वेतन’ सरकार पर बढ़ेगा बोझ
पिछली सुनवाई में सरकार ने कोर्ट से कहा था कि पुराने नियमित शिक्षकों के रिटायरमेंट के साथ ही पद भी समाप्त किया जा रहा है। सरकार लगातार कोर्ट में तर्क दे रही है। कि नियोजित शिक्षक सरकारी कर्मी नहीं हैं। इनका नियोजन पंचायत और नगर निकायों के विभिन्न नियोजन इकाइयों के माध्यम से की गई है। सरकार के मुताबिक समान काम समान वेतन देने पर सरकार को सालाना 28 हजार करोड़ का बोझ पड़ेगा। एरियर देने की स्थिति में 52 हजार करोड़ भार पड़ेगा।

