होलिका दहन गुरुवार 17 मार्च की मध्य रात बाद और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा शनिवार को हस्त नक्षत्र व वृद्धि योग में 19 मार्च को होली मनायी जाएगी। रंगोत्सव यानी होली के त्योहार को लेकर दोनों मिथिला व बनारसी पंचांग एकमत हैं। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 17 मार्च गुरुवार को दोपहर 1.13 बजे से आरंभ हो रहा है, जो 18 मार्च शुक्रवार को दोपहर 1.03 बजे तक रहेगा। होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में रात के समय भद्रामुक्त काल में होता है। 17 मार्च की मध्य रात्रि बनारसी पंचांग के अनुसार 12:57 बजे और मिथिला पंचांग के मुताबिक रात्रि 1.09 बजे तक भद्रा रहेगा, इसीलिए होलिका दहन का कार्य इसके बाद होगा। व्रत की पूर्णिमा 17 मार्च को और स्नानदान की पूर्णिमा 18 को मनेगी। इस बीच ग्रामीण इलाके में होलिका दहन की तैयारी शुरू हो गई है। शहर में माहौल थोड़ा अलग है। यहां चौक-चौराहों पर लकड़ियां जमा करने का क्रम शुरू है।
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होलिका दहन की परंपरा हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था। अपने बल के आगे वह भगवान को भी नहीं मानता था। उसने अपने राज्य में भगवान का नाम लेने पर भी पाबंदी लगा दी थी। प्रजा उसके अत्याचार से त्राहिमाम कर रही थी। लेकिन, हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान का भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से नाराज होकर हिरण्यकश्यप ने उसे कई बार कठोर दंड दिए। बावजूद प्रह्लाद ने ईश्वर की भक्ति नहीं छोड़ी।
हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था। हिरण्यकश्यप ने उसे आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद लेकर आग में बैठे। लेकिन, आग में बैठने पर ऐसा कुछ चमत्कार हुआ कि होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। इसके बाद भगवान विष्णु नरसिंह के रूप में गोधुली बेला में प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में उसी दिन से होलिका जलाई जाती है और अगले दिन होली मनाई जाती है।

