गंगा के पानी में अब इतने हानिकारक कीटाणुओं की संख्या बढ़ गई है कि उसे बरारी स्थित 100 साल पुराने ट्रीटमेंट प्लांट से फिल्टर करना मुश्किल काम हाे रहा है। कभी निर्मल जल के लिए जानी जाने वाली गंगा की धारा अब नाले के पानी में बदल चुकी हैं। लिहाजा बरारी प्लांट की क्षमता फेल हाे रही है। इसके चलते इस प्लांट से सप्लाई का पानी पीने वाली शहर के 12 वार्डाें के करीब सवा लाख आबादी की सेहत खतरे में है।


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दाे दिन पूर्व शनिवार काे पर्यावरणविद दीपक कुमार ने बूढ़ानाथ घाट के उस पार बीच धारा में 20 फीट गहराई से कांच के ग्लास में जब पानी निकाला ताे उसमें सैंकड़ाें जीवाणु बिना माइक्रोस्कोप से नंगी आंखाें से ही दिख रहे थे। वहीं, माइक्रोस्कोप से देखने पर यह संख्या और आकार बढ़ सकती है। खुद प्रदूषण नियंत्रण बेरड़ की टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि पटना से लेकर कहलगांव तक गंगा की धारा अब जहरीली हो चुकी है। इसमें लाख से ज्यादा कीटाणुओं की संख्या मिली है, जिसे फिल्टर करना मुश्किल है। 100 मिली लीटर पानी में 500 से ज्यादा टाइटल कैलीफार्म मिलना ही सेहत के लिए खतरनाक है।

भागलपुर के पर्यावरणविद दीपक कुमार ने कोरोना में 16 जून 2020 काे भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून की टीम के साथ गंगा किनारे बसे तीन शहरों के जगहों से पानी सहित मिट्टी का सैंपल लिया ताे पानी पूरी तरह साफ दिख रहा था। उस वक्त कल-कारखाने, वाहनाें की आवाजाही बंद थी। गंगा में नालों के जरिए खतरनाक केमिकल भी नहीं गिराए जा रहे थे।

इस वजह से पानी साफ था लेकिन अब उसी गंगा के पानी में नंगी आंखाें से कीटाणुओं काे देखा जा सकता है। नगर निगम के सिटी मैनेजर अमरेंद्र कुमार का कहना है कि साफ पानी गंगा के बीच की धारा से लाने के लिए बुडके के इंजीनियर काे एस्टीमेट बनाने को कहा गया है।

गंगा में शुद्ध पानी नहीं, नालाें के भराेसे ही बचे जलस्राेत से हाे रहा काम
हैवी मैटल्स की जांच ही नहीं
पिछले दिनों नगर अनायुक्त डाॅ. योगेश कुमार सागर ने भी ट्रीटमेंट प्लांट का जायजा लिया था, जहां पानी गंदा मिला था। पीएचईडी लैब में भी रिपोर्ट का अध्ययन किया था। जानकारी है कि लैब में भी सार्स वाटर में जीवाणु मिले थे। इस लैब की क्षमता अब भी सिर्फ 14 तरह के जांच करने की है। उसमें कितने तरह के जीवाणु रहते हैं यह पता नहीं लगाया जा सकता। सिर्फ आम भाषा में समझने के लिए पानी में मटमैलापन की बात कही गयी थी। हैवी मैटल्स कितनी मात्रा में है। इसका पता लैब से नहीं लग पाता है। रजिस्टर्ड एनए बीएल लैब में सैंपल नहीं भेजा गया था।

ये है विकल्प
वार्ड-21 के पार्षद सह स्थायी समिति सदस्य संजय कुमार सिन्हा ने सुझाव दिया है कि गंगा में चैनल बनाने व पानी लाने में लंबा वक्त लगेगा। उसमें भी पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं रहेगी। साफ पानी लाने के लिए बरारी पुल घाट के दूसरे छाेर पर जहां साफ पानी है, वहां पर चार नाव एक साथ बांधकर दाे मैटर पंप से पानी खींचकर पाइप के जरिए इंटेकवेल तक पहुंचाया जाए ताे इस समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकता है। वार्ड 25 के पार्षद गोविंद बनर्जी ने कहा कि दूसरा विकल्प यह है कि वाटर वर्क्स के सामने जमीन के अंदर ढाई से तीन किलोमीटर पाइप बिछाकर पानी लाने का कार्य स्थायी तौर पर किया जा सकता है।

बोले- डाॅ. राजीव सिन्हा दस्त, हैजा और पीलिया का खतरा
गैस्ट्राेइंट्राेलाॅजिस्ट डाॅ. राजीव सिन्हा ने बताया कि अनारदाने सिस्टम रिवर्स ऑस्माेसिस के जरिये पानी काे शुद्ध किया जाता है। ऐसा नहीं होने पर दस्त, हैजा, पीलिया, टाईफाइड आदि जलजनित बीमारियां हाे सकती है, जहां का पानी गंदा हाे उसे उबालकर छानने के बाद पीना चाहिए।

भागलपुर में पानी दूषित होने के ये चार महत्वपूर्ण कारण

  • सिल्क कपड़े के निर्माण में इस्तेमाल खतरनाक केमिकल का पानी सीधे गंगा में गिरना
  • शहर के 40 बड़े व सैंकड़ाें छाेटी नालियों का पानी बिना फिल्टर किए गंगा में मिल जाना
  • गंगा धारा धीरे-धीरे सिमटना, जिससे पानी का बहाव लगातार कम हो रहा है
  • पानी का तेज बहाव नहीं हाेना, गंगा में सिल्ट भरने के चलते पानी का ठहराव न हाेना

बरारी पूल घाट से वाटर वर्क्स के इंटेकवेल तक पानी लाने के लिए बुडके के इंजीनियर काे कहा गया है। सोमवार काे वह दफ्तर में नहीं थे, अब होली के बाद इस योजना काम हो पाएगा। पेयजल हमारी प्राथमिकता में है। इसके विकल्प की तलाश में हम लगे हुए हैं। -डाॅ. वसुंधरा लाल, मेयर

By न्यूज़ डेस्क

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