देश में भवान सूर्य के गई प्रख्यात मंदिर है। सभी के अपने महत्व हैं। लेकिन बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर का अपना इतिहास है। मंदिर को लेकर कई किंवदंती सुर्खियों में है। सूर्य मंदिर को ध्वस्त करने की योजना औरंगजेब ने बनाई थी लेकिन मुंह की खानी पड़ी थी। छठ पर्व के दौरान यहां भव्य मेला लगता है।

औरंगाबाद से 18 किलोमिटर दूर देव स्थित सूर्य मंदिर करीब सौ फीट ऊंचा है। मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था। देव सूर्य मंदिर देश की धरोहर एवं अनूठी विरासत है। हर साल छठ पर्व पर यहां लाखों श्रद्धालु छठ करने झारखंड, उतरप्रदेश समेत कई राज्यों से आते हैं। कहा जाता है तो जो भक्त मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

राजा ऐल ने बनवाया मंदिर

मान्यता है कि सतयुग में अयोध्या के निर्वासित राजा ऐल एक बार देव इलाके के जंगल में शिकार खेलने गए थे। शिकार खेलने के समय राजा को शौच लगा। उन्होंने अपने आदेशपाल को लोटा भर पानी लाने को कहा। आदेशपाल पानी की तलाश करते हुए एक गड्ढा के पास पहुंचा। वहां से उसने एक लोटा पानी लेकर राजा को दिया। राजा के हाथ में जहां-जहां पानी का स्पर्श हुआ वहां का कुष्ठ ठीक हो गया। उसने इस पानी के बारे में अपने आदेशपाल से पूछा।

आदेशपाल डरते हुए तालाब के पास ले गया। वहां राजा उस गड्ढे में कूद गए और उनके शरीर पर उभरा कुष्ठ रोग ठीक हो गया। उसके बाद उसी रात जब राजा रात में सोए हुए थे तो उसे सपना आया कि जिस गड्ढा में उसने स्नान किया था, उस गड्ढा में तीन मूर्ति ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का है। राज ने मूर्ति स्थापित कर मंदिर बनाया।

तीन स्वरूपों में विराजमान हैं भगवान सूर्य

देव में छठ करने का अलग महत्व है। यहां भगवान सूर्य तीन स्वरूपों में विराजमान है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के रूप में विराजमान है। मंदिर में स्थापित प्रतिमा प्राचीन है। मंदिर का सर्वाधिक आकर्षक भाग गर्भगृह के ऊपर बना गुंबद है जिस पर चढ़ पाना असंभव है।

गर्भगृह के मुख्य द्वार पर बायीं ओर भगवान सूर्य की प्रतिमा और दायीं ओर भगवान शंकर के गोद में बैठे मां पार्वती की प्रतिमा है। ऐसी प्रतिमा सूर्य के अन्य मंदिरों में नहीं देखा गया है। गर्भ गृह में रथ पर बैठे भगवान सूर्य की अदभूत प्रतिमा है। मंदिर में दर्शन को ले श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है।

छठ मेला के दौरान मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था होती है। यहां पर्यटन विभाग एवं जिला प्रशासन के प्रयास से प्रत्येक वर्ष सूर्य अचला सप्तमी को महोत्सव का आयोजन कराया जाता है। देव सूर्य मंदिर अपनी शिल्पकला एवं मनोरमा छटा के लिए प्रख्यात है। आपही पालनहार हैं क्षमा करहूं क्लेष, तीन रूप रवि आपका ब्रह्म, विष्णु, महेश।

कार्तिक एवं चैत में छठ करने कई राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते है। सूर्यकुंड तालाब का विशेष महत्व है। छठ मेला के समय देव का कस्बा लघु कुंभ बन जाता है। छठ गीत से देव गुंजायमान हो उठता है। संस्कृति की प्रतीक सूर्यकुंड को गवाह मानकर व्रती जब छठ मैया और सूर्यदेव की अराधना करते हैं तो उनकी भक्ति देखने बनती है। यहां छठ में जाति एवं मजहब समाप्त हो जाता है।

पश्चिमाभिमुख है देव द्वार

देश में स्थित सभी सूर्य मंदिरों का द्वार पूरब दिशा की ओर है परंतु देव सूर्य मंदिर का द्वार पश्चिमाभिमुखी है। कहा जाता है कि औरंगजेब अपने शासनकाल में अनेक मूर्तियों एवं मंदिरों को ध्वस्त करते हुए देव पहुंचा। वह मंदिर तोडऩे की योजना बना रहा था कि लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई। लोगों ने ऐसा करने से मना किया परंतु वह इससे सहमत नहीं हुआ।

औरंगजेब ने कहा कि अगर तुम्हारे देवता में इतनी ही ताकत है तो मंदिर का द्वार पूरब से पश्चिम कर दें। ऐसा होने पर उसने छोड़ देने की घोषणा की। कहते हैं कि दूसरे दिन सुबह जब लोगों ने देखा तो मंदिर का प्रवेश द्वार पूरब से पश्चिम हो गया था। इसके बाद औरंगाबाद ने मंदिर तोडऩे का इरादा बदल दिया।

देव माता अदिति ने की थी पूजा

मंदिर को लेकर प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गए थे तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की अराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान जिन्होने असुरों पर देवताओं का विजयी दिलाई। कहते हैं कि उस समय सेना षष्टी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन प्रारंभ हुआ।

स्नान के बाद चंदन लगाते हैं भगवान सूर्य

देव सूर्य मंदिर में विराजमान भगवान सूर्य प्रत्येक दिन स्नान करते हैं, चंदन लगाते हैं। नया वस्त्र धारण करते हैं। आदि काल से यह परंपरा चली आ रही है। मुख्य पुजारी सच्चिदानंद पाठक ने बताया कि प्रत्येक दिन सुबह चार बजे भगवान को घंटी बजा जगाते है। जब भगवान जग जाते हैं तो पुजारी स्नान कराते हैं। भगवान के ललाट पर चंदन लगाते है। फूल-माला चढ़ाने के बाद खुशी होने केलिए आरती दिखाते है।

भगवान को आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ सुनाया जाता है। पुजारी ने बताया कि भगवान को तैयार होने में 45 मिनट का समय लगता है। जब भगवान तैयार हो जाते हैं तो 5.30 बजे श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पट खोल दिया जाता है। छह बजे तक भगवान श्रद्धालुओं के लिए गर्भ गृह के आसन पर विराजमान रहते हैं। शाम छह बजे भगवान का पट बंद कर दिया जाता है। फिर वहीं स्नान, ध्यान, चंदन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पुन: 8 बजे श्रद्धालुओं के लिए पट खोल दिया जाता है और रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है।

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By न्यूज़ डेस्क

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