बिहार के औरंगाबाद में एक गांव है- ‘दौलतपुर’, लेकिन इसका ‘दौलत’ से कोई वास्‍ता नहीं है। विकास से कोसों दूर इस गांव की अधिकांश आबादी भीख मांगकर गुजर-बसर करती है।

औरंगाबाद के गया रोड से सटे बसे दौलतपुर के भुईयां टोला में करीब एक दर्जन परिवार नट जाति के हैं। यहां की महिलाएं पेट भरने के लिए भीख मांगती हैं। खास बात यह है कि केवल महिलाएं ही भीख मांगती हैं। गांव की सविता देवी, धानमती देवी, अनिता देवी, गुडिय़ा देवी, मीना देवी, सुनैना देवी, खुरमा देवी, सपना देवी, चंदा देवी, हेमंती देवी, रूबी देवी, कांति कुवर बताती हैं कि मांगकर खाना ही उनका पेशा है।

यहां की महिलाएं 10 किलोमीटर दूर तक मांगने चली जाती हैं। यदि कहीं से भोज की सूचना मिलती है तो पूरा गांव चला जाता है। मुफ्त में स्वादिष्ट भोजन का इंतजार यहां बच्‍चों से लेकर वृद्धों तक, सभी को रहता है।
मूलभूत सुविधाओं का अभाव

गांव में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शिक्षा व स्‍वास्‍थ्‍य व बिजली-पानी जैसी सुविधाओं तक का अभाव है। अधिकांश आबादी निरक्षर है।

दाउदनगर-गया रोड से दौलतपुर के नाम पर सड़क बनी है, मगर वह दौलतपुर तक पहुंचती नहीं है। सड़क पहुंचती तो भुईयां टोला की पहुंच भी मुख्य पथ से हो जाती। गांव में पीसीसी सड़क दिखती है, किंतु टोले से बाहर का संपर्क नहीं है।
मुख्य पेशा पशु गर्भाधान
नट जाति का मुख्य पेशा पशु गर्भाधान का है। दौलतपुर के भुईयां टोला के नट परिवार भैंसा व सांढ़ रखते हैं। जिन पशुपालकों को पशु को गर्भ धारण कराने की आवश्यकता होती है, वे कभी भी अपना पशु लेकर गांव चले जाते हैं और नट बिरादरी वाले पशु का गर्भाधान करा देते हैं। इसके बदले वे पैसा लेते हैं।

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By न्यूज़ डेस्क

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