भागलपुर। मैथिल समाज की नवविवाहिताओं का प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्व मधुश्रावणी व्रत इस वर्ष 3 अगस्त से 15 अगस्त तक मनाया जाएगा। 13 दिनों तक चलने वाला यह व्रत अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। पर्व को लेकर घरों से लेकर बाजारों तक उत्साह का माहौल है।
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बाजारों में बढ़ी रौनक, हरी साड़ियों की मांग तेज
मधुश्रावणी व्रत के मद्देनजर नवविवाहिताएं हरी साड़ी, हरी चूड़ियां और पूजन सामग्री की खरीदारी में जुट गई हैं। कपड़ा और श्रृंगार की दुकानों पर इन दिनों हरियाली की विशेष छटा देखने को मिल रही है।
ऐसे होती है मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत
सावन माह की पंचमी तिथि से नवविवाहिताएं स्नान के बाद पूजा स्थल को सजाकर पंडितायन के मार्गदर्शन में विधि-विधान से पूजा करती हैं। कमल या पुरइन के पत्ते पर पारंपरिक आकृतियां बनाई जाती हैं और भगवान शिव, माता गौरी तथा नाग-नागिन की प्रतिमाएं स्थापित कर नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद पूरे श्रद्धाभाव से व्रत का क्रम शुरू होता है।

13 दिनों तक होती हैं धार्मिक कथाएं और लोकगीत
मधुश्रावणी व्रत के दौरान प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक कथाओं का श्रवण कराया जाता है। इनमें मैना पंचमी, विषहरी, बिहुला, मनसा, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, समुद्र मंथन और सती की कथाएं प्रमुख हैं। सुबह की पूजा में गोसांई और पावनी गीत, जबकि शाम को कोहबर और संझौती गीतों से वातावरण भक्तिमय बना रहता है।
15 अगस्त को होगा व्रत का समापन
पंडित के अनुसार 15 अगस्त को तृतीया तिथि पर विशेष पूजा के साथ व्रत का समापन होगा। इस दिन भाई-बहन से जुड़ी पारंपरिक रस्म निभाई जाती है, जिसमें भाई अपनी बहन को उठाकर नैवेद्य ग्रहण कराता है।
मैथिल समाज में यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। नवविवाहिताएं पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ पूरे श्रद्धा और उल्लास से इस पर्व को मनाती हैं।
