नवगछिया : नवगछिया बिहुला चौक की छोटी ठाकुरबाड़ी रोड में शुक्रवार को संता पूजन व बिहुला के मड़वा पूजन के साथ बिहुला विषहरी पूजा का शुभारंभ हो गया। शनिवार की सुबह माता विषहरी के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। हालांकि पूजा की तैयारी एक माह पहले से मंदिरों में शुरू हो गई थीं। बिहुला विषहरी के लोकगीत गूंजने लगे थे।
लंबे समय तक इस परंपरा को महज एक गाथा की मान्यता रही। लेकिन अब लेखकों के कलम ने इस पूजा को अंग प्रदेश का इतिहास बनाने में काफी मदद की है। समाजशास्त्री मानते हैं कि यह महज परंपरा नहीं बल्कि समाज की नजर में विशिष्टता और गौरव की गाथा है। इसलिए नई पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़ती चली जा रही है। समाजशास्त्र के प्राध्यापक आईके सिंह कहते हैं कि भारत परंपराओं और मूल्यों का देश है। यहां जितनी धार्मिक या अच्छी सामाजिक परंपराएं हैं।
उनकी जड़े गहरी हैं। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के पूर्व निदेशक एवं भागलपुर के एतिहासिक विषयों पर लिखने वाले शिवशंकर सिंह पारिजात कहते हैं कि बिहुला विषहरी की कहानी को बंगाल में मनसा मंगल काव्य के नाम से जाना जाता है। एनएल डे ने अपनी किताब ‘एनसिएंट ज्योग्राफी ऑफ इंडिया’ में लिखा है कि बिहुला विषहरी की घटना चंपानगर में घटित हुई है।

मंजूषा कला के जरिये देश दुनिया में बिहुला विषहरी की परंपरा दस्तक दे रही है। हाल ही में रेलवे ने विक्रमशिला की पूरी रैक पर मंजूषा पेंटिंग करायी है। नवगछिया स्टेशन भागलपुर स्टेशन पर मंजूषा को उकेरा गया है। वहीं, सिल्क, लिनन और हैंडलूम कपड़ों पर मंजूषा की प्रिंटिंग पहले से हो रही है। इन कपड़ों की विदेशों में भी मांग है।

