प्रतियोगिता परीक्षाओं में ऊपरी आयुसीमा और व्याप्त आर्थिक विषमता

वेद कहता है :

“नहीं दरिद्र सम दुःख जग माही” अर्थात दरिद्रता से बढ़कर कोई दुख नहीं, “दरिद्रता” दुःख हीं नहीं अपितु समस्त दुःखों की जननी है…


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अतः हमें सर्वप्रथम हमारे समाज में व्याप्त गरीबी को जड़समूल दूर कर/करने के लिए विष्मतापोषित ग्रामीण युवा अभ्यर्थियों के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं में स्वतन्त्र अवसर प्रदान कर समाजिक न्याय के साथ राष्ट्रकल्याण सुनिश्चित करना होगा।

आज हम सबों के लिए कितने दुख की बात/विडंबना है की आजादी के इकहत्तर साल बीतने के बाद भी देश की बहुत बड़ी आबादी लगभग 60% गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी से जूझ रही है जबकि आजादी के नायकों ने देश के लिए जो स्वर्णिम स्वप्न देखे थे वो समय के साथ धूमिल होते गए। ऐसा नहीं कि हमारे देश मे संशाधनों की कमी थी, इन संसाधनों का कुछ मुठ्ठी भर लोगों ने दोहन किया, अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति की जिससे एक तरफ जहाँ कुछ लोगों ने अकूत धनसंचय किया वहीं दूसरी ओर एक बहुत बड़ी आबादी दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़ रहे हैं। आसमान आर्थिक खाई हो जाने से गुजरते वक्त के साथ रोजगार, विनिवेश, शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर पूंजीपतियों/धनकुबेरों का अधिकार हो गया व वंशवाद में रूपांतरित हो गए जिससे पूर्ववर्णित सुविधाओं से बहुत बड़ी आबादी वंचित होती चली गई। आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के पास हीं निवेश/रोजगार की क्षमता हो गई, बाकी को काफी मसक्कत होने लगी।
हाल हीं में ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने सी.आर.आई. (C.R.I.- Commitment to Reducing Inequality) इंडेक्स की रिपोर्ट जारी की है सूची में शामिल 157 देशों में भारत अंतिम के 15 देशों के बीच खड़ा है जिस में गैरबराबरी कम करने के प्रति सबसे कम प्रतिबद्धता देखी गई है। इस मामले में नाइजीरिया जैसे देशों के करीब आ पहुंचे भारत को 147 वा रैंक दिया गया है, ऑक्सफैम ने भारत के बारे में कहा कि देश की स्थिति बेहद नाजुक है और यहां की लोकतांत्रिक सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा पर बहुत कम खर्च कर रही है है वहीं निजी सेक्टर को सब्सिडी प्रदान करती है। हालिया दशक में भारत में आर्थिक विषमता उच्चतम स्तर पर है और बहुत तेजी से बढ़ी है इसका बड़ा कारण “सुपर रिच क्लास” का उदय होना रहा है। पिछले साल हीं यह तथ्य सामने आया था कि देश की 1% आबादी के हिस्से में देश की 73% संपत्ति आती है, 67% भारतीय गरीबी रेखा से नीचे बसर करते हैं। भारत की 27.5% आबादी बहुआयामी गरीबी की मार झेल रही है और कुपोषण का शिकार हो रही है वहीं 8.6 प्रतिशत भारतीय इतने गरीब हैं कि उनके लिए दोनों समय भोजन जुटाना सपने जैसा बनते जा रहा है।
आर्थिक विषमता की शुरुआत हीं संपत्ति के असमान वितरण से होती है, वहीं दूसरी तरफ गौर करें तो सबसे अमीर भारतीय मुकेश अंबानी की 1 दिन की कमाई 300 करोड़ को पार कर गई है, कुल 831 भारतीय की संपत्ति 1000 करोड़ से ज्यादा मूल्य की है, 273 लोगों की आमदनी चार करोड़ से ज्यादा है।
भारत जैसे देश में आर्थिक विषमता औरभी बड़ी समस्या मानी जानी चाहिए क्योंकि यहां लोग केवल गरीबी और अमीरी ही नहीं बल्कि लोग धर्म, जाति, समुदाय आदि के आधार पर भी बंटे हुए हैं इसलिए भारत जैसे देश को आर्थिक विषमता और अधिक क्षति पहुंचाती है। एक बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में लोकतंत्र के दीर्घकालीन अस्तित्व के लिए इस विषमता को समाप्त करना बहुत जरूरी है। हमारी लोकतांत्रिक सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है कि वह इस दिशा में काम करें, इस संदर्भ में नीतिगत स्थायी समाधान हेतु नीतिनिर्धारण के केंद्र में गरीब/आर्तजनों की पीड़ा/मजबूरी/आवश्यकता शामिल कर विषमता की खाई को पाटे व इनके स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर काम किया जाए और संपत्ति के असमान वितरण को दूर करने का स्थायी प्रयास किया जाए।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (G.H.I.) जो वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भुखमरी का आकलन करती है, में भारत लगातार बढ़ता जा रहा है। इस मामले में साल 2014 में भारत 99वें, 2015 में 80वें, 2016 में 97वें, 2017 में 100वें, इस साल 2018 के लिए हुए सर्वे में 119 देशों में से 103वें स्थान पर पहुंचा यानी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भूख की स्थिति बेहद गंभीर है। जबकि हाल ही में हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की 2018 बहुआयामी वैश्विक गरीबी सूचकांक के मुताबिक 2005-06 से 2015-16 के बीच एक दशक में भारत में 27 करोड लोग गरीबी रेखा से बाहर निकल गए। मतलब इन लोगों की प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय 32 ₹ से अधिक हो गई, ताज्जुब की बात है न..!! “गरीब लहरों पे पहरे बिठाए जाते हैं, समंदर की तलाशी क्यों नहीं होती” हैरत होती है इस तरह के गैरजिम्मेदाराना नीतियाँ बनाने वाले नौकरशाही व्यवस्था पर और तरस आती है उन लोगों पर भी की इस विषमताओं को जूझते हुए उनकी सांसें चलती रहती हैं इस आशा से की कोई रहनुमा जरूर आएगा जो उनको आँखों के आंसुओं को महशुस करेगा व निदान करने को नीतियों में बदलाव लाएगा जिससे इनकी दैनन्दिनी में चर्मोत्कर्ष होगा।
राष्ट्रीय जीवन में आर्थिक विषमता एक भयावह सच है, राजनीति और समाज में भले ही गाहे-ब-गाहे इसे दूर करने के प्रयासों की चर्चा हो जाती है पर वास्तविकता यही है कि इस समस्या को लोकतांत्रिक स्वतन्त्र भारत का एक अस्थाई लक्षण मान लिया गया है। हमारी राष्ट्रीय संपत्ति का 77% भाग सबसे अधिक धनी 10% जनसंख्या के हाथ में है और समानता का यह विस्तार पिछले कुछ समय से लगातार जारी है। आर्थिक विषमता के लिए लिहाज से भारत विश्व के दूसरे स्थान पर है।जबकि लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ संपदा के न्यायपूर्ण वितरण की व्यवस्था होती है ताकि कोई अपनी आर्थिक शक्ति के बल पर दूसरों की हितों और अधिकारों का हनन ना कर सके।
क्या आर्थिक नीतियां देश के धनी वर्ग की पक्षधर है और हमारा शासन आबादी के बड़े हिस्से के बड़े हिस्से के लिए आर्थिक सक्षमता सुनिश्चित करने में लापरवाह है..?? नव उदारवादी दौर में असमानता निरंतर बढ़ती ही जा रही है पर हमारे राजनीतिक चिंता में यह प्रमुख एजेंडा क्यों नहीं बन पा रही है, इन सवालों का सीधा संबंध हमारे लोकतंत्र की सफलता से है। कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी व्यापक विषमताओं को देर तक नहीं ढो सकती क्योंकि आर्थिक समानता के साथ ही राजनीतिक और सामाजिक समानता के लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि “आर्थिक विषमता तभी सही है जब वह सर्वाधिक गरीब की आय को बढ़ाने का मध्यम हो”
आज वंचित तबकों के उत्थान के लिए निर्धारित नीतियों-कार्यक्रमों की ठोस समीक्षा जरूरी है। उदार और गतिमान अर्थव्यवस्था के साथ शिक्षा व रोजगार के स्वतन्त्र अवसर को स्थाई बनाने के साथ लोकतंत्र को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक विषमता पर गंभीरता से विचार करना समय की मांग है

साहिर लुधियानवी की एक सेर है :

ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया,
ये दौलत की भूखे है रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है….

“विकास” केवल आर्थिक वृद्धि हीं नहीं, आर्थिक वृद्धि और विकास में बहुत फर्क होता है,विकास एक”उद्देश्य” है और आर्थिक वृद्धि केवल माध्यम। विकास का मतलब यह है कि जीवन की गुणवत्ता बढ़ रही है व आम लोगों के जीवन में सुधार लाया जा रहा है,अजीब बात यह है कि स्वास्थ्य, शिक्षा व सामाजिक सुरक्षा जीवन की गुणवत्ता व आर्थिक विकास का आधार होने के बावजूद लोकतंत्र में इन मामलों की बात नहीं होती।
पिछले चार सालों में केंद्र सरकार ने सामाजिक निति में कोई रुचि नहीं ली,व्यावसायिक घरानों को निति निर्धारण के केंद्र में रख कर नई नीतियां बनाई गईं जिससे ग्रामीण भारत की जनता व युवा वर्ग में सरकार के प्रति घृणा काफी बढ़ी व लोकतंत्र में आस्था कमी हुई व लोग सोचने पर मजबूर हुए की आखिर किसलिए हम सरकारें चुनते हैं…?? ऐसी नीतिगत फैसले से लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ती जा रही है..??

उपरोक्त वर्णित विभेदकारी सामाजिक स्थितियों के बीच सुबह सूरज उगने के साथ हीं जैव वनस्पतियों में हलचल शुरू हो जाती है,पत्ते अपनी बाँहें खोलने लगते हैं और फूल मुस्कुराने लगते हैं। इन्हीं के बीच एक और रंग खिलता है…बच्चों के स्कूल ड्रेस का रंग जो बिना किसी शोर~शराबे के मद्धम~मद्धम गाँव की पगडंडियाँ चलने लगता है। यह वह भारत है जहाँ बच्चे बासी भात या आधा पेट,बिना नास्ता और टिफिन के अधूरी किताब~काँपी को झोले में लटकाए सूरज के साथ दौर लगाते हैं। यह उदासीन भारत नहीं है,यह सपनों से भरा हुआ भारत है,जहां जिजीविषा है,संघर्ष है। शिक्षा के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व का अभाव बहुत बड़ी विडम्बना है। भले हैं आज हमारा भारतवर्ष वैश्वीकरण का भारत है,भले हीं आज हम वैश्विक बाजार की गिरफ्त में उदारवादी~पूंजीवादी तरीके से विकास की दौर में शामिल हो रहे हैं लेकिन इसकी गिरफ्त में चिकित्साशिक्षा को लेना समाज के लिए घातक होगा। इससे समाज मे हो रही विभाजन की खाई घातक होगी। ग्रामीणभारत के सुदूरवर्ती अंचलों के विद्यार्थियों और शहरों के विद्यार्थियों के शिक्षा के हर चरण में गहरा फर्क है। इसके बावजूद खुली प्रतियोगिता में दोनों को समान रूप से उतरना पड़ता है। शहरों में हर कोई प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम की ओर रुख कर रहा है और सरकार भी शिक्षा के निजीकरण पर जोर दे रही है। लेकिन उन सुदूर ग्रामीणभारत के अँचलों में कौन है जो शिक्षा का निवेश करने जाएगा ? कौन गरीब ग्रामीण जनता है जो अपने व अपने बच्चों के लिए इतनी महंगी शिक्षा को खरीद सकेगा, बावजूद इसके ग्रामीण विद्यार्थी प्रतियोगिता परीक्षाओं में उन अभ्यर्थियों के साथ एकसाथ सम्मलित होते हैं व असफल हो जाते हैं, हों भी क्यों न…!! इन्हें न अच्छी प्राथमिक/माध्यमिक/उच्चतर शिक्षा मिलती हैं, न अच्छी किताबें, न अच्छे शिक्षक और न हीं उचित माहौल, कौन इन ग्रामीण भारत के अंचलों में शिक्षा के क्षेत्र में निवेश कर यहां के विद्यार्थियों को समुचित सस्ती शिक्षा व प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए सुलभ कोचिंग मुहैय्या कराएगा।ग्रामीण अंचलों के अधिकतर अभ्यार्थी तो अपने परिवार के भरण- पोषण के लिए स्वध्याय के साथ जीविकोपार्जन भी करते हैं जिस कारण इन्हें प्रतियोगिता परीक्षा के लिए खुद को तैयार करने में लंबा वक्त लग जाता है, समय लगना तो लाजमी है क्योंकि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता वो अपनी निर्धारित गति से अनवरत चलता हीं रहता है। ग्रामीणभारत की ऐसी विषम परिस्थितियों की स्थिति में प्रवेश परीक्षाओं में ऊपरी आयुसीमा का निर्धारण क्या ग्रामीण विद्यार्थियों की प्रतिभा का गला नहीं घोंटेगा ? ये तो ऐसा हीं जैसे “हाथी, कौआ, मछली, कुत्ता आदि” जानवरों के बीच पेड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता आयोजित हो रही हो…!!

सरकारी नीतियाँ ऐसी हों कि सबके लिए शिक्षा/रोजगार सुनिश्चित हों,ऊपरी आयुसीमा की आढ़ में कोई वंचित न रहें। यदि इन ग्रामीण युवा अभ्यर्थियों की मानवता और राष्ट्रकल्याण/समाजकल्याण के लिये जिजीविषा, जिज्ञासा व जुनून है, ये अपने स्वध्याय के दम पर समाज के लिए कुछ नया करने का मद्दा रखते हैं तो हमारी स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व नौकरशाही व्यवस्था प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए पूर्व निर्धारित पात्रता मापदंड में नित नए नए संशोधन कर इनका दमन क्यों कर रही है..?? क्या ये ग्रामीण युवा स्वतंत्र भारत के निवासी नहीं हैं..?? क्या ये किसी दूसरे देशों से निर्वासित होकर आये हैं..?? क्या इन्हें स्वतन्त्र भारत में अपनी स्वतन्त्र महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का अधिकार नहीं है..?? क्या हमारे देश की संघीय व्यवस्थान्तर्गत संवैधानिक अधिकार जैसे राइट ऑफ एडुकेशन, राइट ऑफ प्रोफेशन का इन युवाओं के लिए संविधान के पन्नों पर वर्णित केवल काले अक्षर मात्र हैं ..?? …यदि नहीं तो इन्हें प्रतियोगिता परीक्षाओं चाहे वो शिक्षा पाने के लिए हों या रोजगार के लिए, में आयुसीमा निर्धारित कर वंचित क्यों किया जा रहा है…??

जबकि “एक दोष व्यक्ति की समृद्धियों में उसी तरह छिप जाता है जैसे चाँद की किरणों में कलंक ; परन्तु दारिद्रय नहीं छिपता। नहीं छिपता हीं नहीं, सौ-सौ गुणों को छा लेता है मतलब गुणों को नष्ट कर देता है” तो क्या आधारभूत सुविधाओं से वंचित ग्रामीण भारत के प्रतिभावान युवा अभ्यर्थी की जिजीविषा, जिज्ञासा व जुनून घुट घुट कर मरते रहेंगे…?? क्या इनके अभ्युदय से चर्मोत्कर्ष लिए कोई ठोस नीति बनने के लिए और कितने युवा अपनी सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक विषमताओं की बलि चढ़ेंगे ? अब पानी सर चढ़ कर बोल रहा है, युवा सोचने पर मजबूर हो रहे हैं कि आखिर हम अपने मताधिकार का प्रयोग कर लोकतांत्रिक सरकार क्यों बनाते हैं ?

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के पुरोधाओं को, नौकरशाही व्यवस्था को उदारवादी होकर इन ग्रामीण युवाओं के लिए वैज्ञानिक सोच के साथ ऐसी नीतियाँ बनाएं जिससे “खो न जाएं ये तारे जमीं के” क्योंकि

“नहीं एक अवलम्ब जगत का आभा पुण्यव्रती की
तिमिर व्यूह में फंसी किरण भी आशा है धरती की”

सबको मुक्त प्रकाश चाहिए
सबको मुक्त समीरण,
बाधा – रहित विकास , मुक्त
आशंकाओं से जीवन।
उभद्विज – निभ चाहते सभी नर
बढ़ना मुक्त गगन में,
अपना चरम विकास खोजना
किसी तरह भुवन में।

देश मे शांति, समृद्धि, परस्पर भाईचारे की जननी “सबका चर्मोत्कर्ष” हीं है, यही एक ऐसा अचूक हथियार है जिससे देश आगे बढ़ेगा, कोई कहीं शोषित न होगा, सभी अपने ईश्वर प्रदत्त गुणों सर धरती के आंचल में नित नए सितारे जड़ते रहेंगे व आने वाली पीढ़ी के लिए समृद्ध समाज उपहार में देते जाएंगे,

हमारे राष्ट्रकवि दिनकर जी लिखते हैं ;

जबतक मनुज मनुज का
सुख भाग नहीं सम होगा,
शमित न होगा कोलाहल,
संघर्ष नहीं कम होगा।

अतः आज ग्रामीण भारत के अभ्यर्थियों के लिए समानान्तर प्रणाली विकशित किये जायें, प्रतियोगिता परीक्षाओं में कोई ऊपरी आयुसीमा निर्धारित न हों, प्रवेश परीक्षा में आयुसीमा के बदले अवसरों की सीमा निर्धारित किये जाएं जिससे सभी विषमतापोषित ग्रामीण युवा अपने उच्चतम आदर्शों को पाने के लिए किसी भी आयु में अपने निर्धारित अवसरों का उपयोग कर सफल होकर राष्ट्रकल्याण में सपनी सहभागिता सुनिश्चित कर अपना योगदान दे सकें व अपने अनुज युवा साथियों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकें।

ये हौसला कैसे झुके,
ये आरज़ू कैसे रुके
मंजिल मुश्किल तो क्या
धुंधला साहिल तो क्या
तनहा ये दिल तो क्या

राह पे कांटे बिखरे अगर
उसपे तो फिर भी चलना ही है
शाम छुपाले सूरज मगर
रात को एक दिन ढलना ही है
रुत ये टल जाएगी
हिम्मत रंग लाएगी
सुबह फिर आएगी

होगी हमें जो रहमत अदा
धुप कटेगी साये तले
अपनी खुदा से है ये दुआ
मंजिल लगाले हमको गले
जुर्रत सौ बार रहे
ऊँचा इकरार रहे,
जिंदा हर जज्बात रहे

वन्दे मातरम, जय हिंद
अक्षय आनन्द श्री, भागलपुर, बिहार.

By न्यूज़ डेस्क

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